Sunday, October 28, 2007

अंतराग्नी '०७ का कवि सम्मेलन
Kavi Sammelan at Antaragni '07, IIT Kanpur

अंतराग्नी 2007 में अगर किसी कार्यक्रम ने मुझे रोमांचित किया तो वो कवि सम्मेलन था. इतना अच्छा कवि सम्मेलन मैंने और अतुलने ना असल ज़िंदगी में देखा है ना ही TV या internet पर. कवि सम्मेलन में मौजूद हर कवि एक से बढ़कर एक था. सम्मेलन की जान था नवोदित कवि कुमार विश्वास. मैंने आज तक किसी कवि को नए ज़माने के लोगों की नब्ज़ इतनी अच्छी तरह पकड़े नही देखा है. कुमार विश्वास के कुछ विडीयो YouTube पर मौजूद हैं. ज़रा नज़र डालिए.




कवि सम्मेलन में मुख्यतः हास्य रस के कवि मौजूद थे. कानपुर शहर की एक शायर शबीना जी भी थीं. वीर रस के कवि विनीत चौहानभी थे. पर कार्यक्रम की सफलता का पूरा श्रेय हास्य कवियों को जाता है. ये युग हास्य रस के कवियों का ही है. क्योंकि कोई और कविता अब बिकती नही. और शायद अच्छा ही है की नही बिकती.

वीर रस के कवि विनीत चौहान को ही ले लें. उनकी कवितायेँ शायद उन्नीसवीं सदी में अच्छी लगती. उनके लिए वीर रस का अर्थ था हिंदुत्ववादीराष्ट्रवाद. उनकी कविताओं का एक ही सार था - पाकिस्तान पर हमला कर दो और उसे मिटा डालो. इक्कीसवी सदी में जहाँ लोग राष्ट्रवाद तक के पुरातन हो जाने की बातें करने लगे हैं, वहां इस तरह की बातें समय के विपरीत लगती हैं. विनीत जी, चीज़ें इतनी सरल नही होती. हम बस एक दिन सो कर उठते ही पाकिस्तान पर हमला नही कर सकते. जीवन बहुत क्लिष्ट होता है. समस्याओं के हल इतनी जल्दी नही पाए जा सकते.

लगभग सारे कवि ही मुझे हिंदुत्ववादी लगे जो एक दो वाक्यों में ही सही पर अपनी बात कह जरूर रहे थे. यह देखकर बहुत दुःख हुआकी आधुनिक चिंतन परम्परा, जिसमे libertarianism या consumerism-capitalism जैसी विचार परम्पराएं फैशन में हैं, से हिन्दी साहित्य एकदम अछूता है. मैं ये नही कह रहा की जो विचार परम्परा ये कवि फैला रहे हैं वो ग़लत है या सही है. बस ये देख कर दुःख हुआ की और कोई विचार परम्परा हिन्दी भाषा में उपलब्ध नही है. फिर कोई आश्चर्य की बात नही है की हमारी ज्यादातर आबादी अभी भी मन्दिर और मस्जिद के मसलों में फ़ंसी हुई है.

सम्मेलन के बाद मैं और अतुल कवियों से मिलने IIT Kanpur के अतिथि घर पहुँच गए. वहाँ कुमार विश्वास जी से कुछ बातें हुई. विश्वास जी हमारी ही पीढ़ी के कवि हैं. एक सेमेस्टर REC में पढने के बाद उन्होंने अभियांत्रिकी छोड़ दी. कहते हैं की बुरा इंजिनियरहोने से अच्छा कवि होना बेहतर है. खैर, ये जानकर आश्चर्य और हर्ष हुआ की अब कवि सम्मेलन भी बजारू होते जा रहे हैं. IIT Kharagpur के कुछ छात्रों ने एक कंपनी शुरू करी है जो कवि सम्मेलन आयोजित करती है. विश्वास जी उनके ही साथ काम करतेहैं. इस से कवि सम्मेलनों की पहुँच बढेगी. पर हर बजारू चीज़ की तरह कुछ बुरी बातें भी हैं. विश्वास जी को हम लोगों से ये शिकायतथी की हम लोगों ने स्टेज वगैरह ठीक से नही सजाया था. मतलब, कवि सम्मेलन है, भाई! कोई फ़िल्म स्टार का शो थोड़े ही है! इतनेअच्छे श्रोता और इतना अच्छा माहौल होने पर भी कवि लोग केवल स्टेज की साज सज्जा से नाराज थे ये बात मुझे कुछ अच्छी नही लगी.

विश्वास जी की कविताओं को ही लें. मुझे नही लगता की उनकी कविता में दम है. हाँ, बोलते अच्छा है जिसकी मैं तारीफ करता हूँ. पर उनका ध्यान कविता पाठ से ज्यादा मार्केटिंग में लगता है. खैर, ये उनके अपने विचार हैं. मेरे ख्याल से अगर बाजारुपन से अगर कविताके स्तर में सुधर हो तो बेहतर है. चमक धमक हम फिल्मों में भी बहुत देख लेते हैं.

खैर, ये अच्छी बात है की नई पीढ़ी के कवि कवि सम्मेलनों की इस परम्परा को जरी रखे हुए है. ये एक ऐसी चीज़ है जहाँ हम पश्चिम सेअभी भी बहुत आगे हैं. वहां कविता पाठ की कभी कोई सभ्यता नही रही. अपनी इस परम्परा को हम बचाए रखें, ये अच्छी बात है.

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