Wednesday, August 22, 2007

लहू का रंग

प्रस्तुत है अतुल जैन द्वारा लिखी हुई एक कविता ...

लहू के एक रंग को
देख पाती हैं
वो आखें
जो या तो पीड़ा से लाल हों
या फिर निर्वेदता से श्वेत,
इसीलिये लहू किसी को लाल
और किसी को सफ़ेद नज़र अता है ...

मगर सिर्फ ये दो रंग ही लहू का दायरा नही
लाश का लहू काला भी होता है
बिल्कुल उस अँधेरे जैसा
जिसके अधिपत्य में उम्मीद की रोशनी रोज़
हर गली हर मोड़ पर दम तोड़ती है

ये ऐसा लाल भी है
जिसे देखकर प्रेमी अनुरागमत्त हो
खुद को भुला
जीवन और मृत्यु का अंतर भी भूल जाते हैं
और उस नमक का श्वेत भी
जो एक कमजोर टूटे इन्सान को
मृत्यु के आगोश से स्वतंत्र जीवन
को निकाल लाने कि हिम्मत देता है

मगर लहू का भी एक असली रंग है
जो चीरता हुआ
राष्ट्रीयता धर्म और जति के आवरणों
मानवता कि नन्गी हड्डियों से टकराता है
जो खोज में सत्ता कि
सड़क पर बहते बहते जम जता है
और खोखले होते इन्सान को
विकास कि सही कीमत बताता है

जिस दिन तुम उन ठिठुरती कड़कड़ाती हड्डियों कि वेदना को सुन पाओगे
उस दिन तुम मेरा, अपनी ही रगों के लहू का
असली रंग देख पाओगे

2 comments:

  1. toh yeh atul jain ki kavitayen apke blog pe kyun.
    unka to apna healthy bachcha hai

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  2. Unka bachha unhealthy ho gaya hai. Isliye unhone mera adopt kar liya hai. :)

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